शिव और शक्ति…
भगवान शिव जी की अर्धांगिनी पार्वती
जी को ही शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा,
स्कंदमाता, कात्यायिनी,
कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री आदि नामों से जाना जाता है।
आदि शक्ति मां दुर्गा का ध्यान करने वाले के जीवन में कभी शोक और दुख नहीं आता। मां का केवल एक रूप है, अनेक नहीं इस रहस्य का ज्ञात होने से जातक भगवान शिव की शक्ति के ओज मंडल में शामिल हो जाता है।
संपूर्ण संसार की उत्पत्ति के पीछे आदि शक्ति मां जगत जननी ही मूल तत्व हैं और जगत माता के रूप में उनकी उपासना की जाती है। शक्ति सृजन और नियंत्रण की पारलौकिक शक्ति है।देवीभागवत के अनुसार शिव भी शक्ति के अभाव में शव या निष्क्रिय बताएं गए हैं। मनुष्य की विभिन्न प्रकार की शक्तियों को प्राप्त करने की अनंत इच्छा ने शक्ति की उपासना को व्यापक आयाम दिया है। यहां प्रस्तुत है माता के अनेकों रूपों का वर्णन। इन्होंने ने ही अपने योग्य पुरूषों का निर्माण किया जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहे जाते हैं|
माता पार्वती, उमा, महेश्वरी, दुर्गा, कालिका, शिवा, महिसासुरमर्दिनी, सती, कात्यायनी, अम्बिका, भवानी, अम्बा, गौरी, कल्याणी, विंध्यवासिनी, चामुन्डी, वाराही, भैरवी, काली, ज्वालामुखी, बगलामुखी, धूम्रेश्वरी, वैष्णोदेवी, जगधात्री, जगदम्बिके, श्री, जगन्मयी, परमेश्वरी, त्रिपुरसुन्दरी,जगात्सारा,जगादान्द्कारिणी, जगाद्विघंदासिनी, भावंता, साध्वी, दुख्दारिद्र्य्नाशिनी, चतुर्वर्ग्प्रदा, विधात्री, पुर्णेंदुवदना, निलावाणी, पार्वती,सर्वमंगला, सर्वसम्पत्प्रदा, शिवपूज्या, शिवप्रिता, सर्वविध्यामयी, कोमलांगी, विधात्री, नीलमेघवर्णा, विप्रचित्ता, मदोन्मत्ता, मातंगी, देवी खडगहस्ता, भयंकरी,पद्मा, कालरात्रि, शिवरुपिणी, स्वधा, स्वाहा, शारदेन्दुसुमनप्रभा, शरद्’ज्योत्सना, मुक्त्केशी, नंदा, गायत्री, सावित्री, लक्ष्मी ,अलंकार, संयुक्ता, व्याघ्रचर्मावृत्ता, मध्या, महापरा, पवित्रा, परमा, महामाया, महोदया इत्यादी देवी भगवती के कई नाम हैं।……शिव स्वरूप वर्णन…
सर्पहार : सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है।
त्रिशूल : शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।
डमरू : शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है।
मुंडमाला : शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है।
छाल : शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है। व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।
भस्म : शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है।
वृषभ : शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ धर्म का प्रतीक है। महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं, जो बताता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते हैं
भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी। शिव जो धारण करते हैं, उनके भी बड़े व्यापक अर्थ हैं :
जटाएं : शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं।
चंद्र : चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है।
त्रिनेत्र : शिव की तीन आंखें हैं। इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों),स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं।



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